डॉ हामी जहाँगीर भाभा – भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक- मृत्यु आज भी एक रहष्य

Dr Bhabha

होमी जहांगीर भाभा भारत के एक प्रमुख वैज्ञानिक और स्वप्नदृष्टा थे जिन्होंने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी। होमी जहांगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुम्बई के एक सभ्रांत पारसी परिवार में हुआ था | उनके पिताजी न नाम जहांगीर और माताजी का नाम मेहरबाई भाभा था उनके पिता पेशे से वकील थे

उन्होंने मुंबई से कैथड्रल और जॉन केनन स्कूल से पढ़ाई की। फिर एल्फिस्टन कॉलेज मुंबई और रोयाल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से बीएससी पास किया। मुंबई से पढ़ाई पूरी करने के बाद भाभा वर्ष 1927 में इंग्लैंड के कैअस कॉलेज, कैंब्रिज इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने गए । हालांकि इंजीनियरिंग पढ़ने का निर्णय उनका नहीं था। यह परिवार की ख्वाहिश थी कि वे एक होनहार इंजीनियर बनें और एक इंजिनियर के तौर पर वे टाटा इंडस्ट्रीज ज्वाइन करे । होमी ने सबकी बातों का ध्यान रखते हुए, इंजीनियरिंग की पढ़ाई जरूर की, लेकिन अपने प्रिय विषय फिजिक्स से भी खुद को जोड़े रखा। न्यूक्लियर फिजिक्स के प्रति उनका लगाव जुनूनी स्तर तक था। उन्होंने कैंब्रिज से ही पिता को पत्र लिख कर अपने इरादे बता दिए थे कि फिजिक्स ही उनका अंतिम लक्ष्य है , और उन्होंने पिता से इस सम्बन्ध अनुमति देने के लिए भी कहा । उन्होंने पिजाजी को अपने पत्र में लिखा कि “मैं फिजिक्स करने की इच्छा से जल रहा हूं। मैं इसे कभी न कभी जरूर करूंगा और करूंगा। यह मेरी एकमात्र महत्वाकांक्षा है. मुझे एक ‘सफल’ आदमी या किसी बड़ी कंपनी का मुखिया बनने की कोई इच्छा नहीं है। ऐसे बुद्धिमान लोग हैं जो इसे पसंद करते हैं और उन्हें ऐसा करने देते हैं… बीथोवेन से यह कहने का कोई फायदा नहीं है, ‘आपको एक वैज्ञानिक होना चाहिए, क्योंकि यह बहुत अच्छी बात है’ जब उन्होंने विज्ञान की परवाह नहीं की; या सुकरात से, ‘एक इंजीनियर बनो: यह एक बुद्धिमान व्यक्ति का काम है।’ यह चीजों की प्रकृति में नहीं है। इसलिए मैं आपसे ईमानदारी से विनती करता हूं कि आप मुझे भौतिकी विषय लेने दें।”

उनके पिता उन्हें सैद्धांतिक भौतिकी का अध्ययन करने, गणितीय ट्राइपोज़ के लिए दाखिला देने पर सहमत हुए, बशर्ते कि वह पहले खुद को अपने मैकेनिकल इन्जीनियरिंग के लिए समर्पित करें और प्रथम श्रेणी प्राप्त करें। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में रहकर सन् 1930 में स्नातक उपाधि अर्जित की। सन् 1934 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उसके पश्चात् जर्मनी में उन्होंने कास्मिक किरणों पर अध्ययन और प्रयोग किए।

भाभा 1939 में छुट्टियों के लिए भारत आए, लेकिन सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के फैलने के कारण उन्हें अपनी योजना बदलनी पड़ी।वह बैंगलोर में भारतीय विज्ञान संस्थान में शामिल हो गए, जहाँ उनके लिए सैद्धांतिक विज्ञान में एक रीडरशिप विशेष रूप से बनाई गई थी। प्रो. सी.वी. रमन, जो उस समय आईआईएससी में थे, होमी भाभा से बेहद प्रभावित थे। 1941 में, भाभा को रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन का फेलो चुना गया। उन्हें 1942 में “प्राथमिक भौतिक कणों का सिद्धांत और उनकी अंतःक्रियाओं का सिद्धांत” विषय पर थीसिस के लिए एडम्स पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

बैंगलोर में अपनी पांच साल की अवधि के दौरान, भाभा को भारत में अनुसंधान गतिविधियों को चलाने की कठिनाई का एहसास हुआ। उन्होंने समझा कि देश में मौजूदा अनुसंधान संस्थानों में से किसी के पास परमाणु भौतिकी, कॉस्मिक किरण भौतिकी, उच्च ऊर्जा भौतिकी और भौतिकी के अन्य क्षेत्रों में मूल कार्य की सुविधा नहीं है।अपने मित्र, जे.आर.डी. टाटा को लिखे एक पत्र में, भाभा ने लिखा, “उचित परिस्थितियों और बुद्धिमान वित्तीय सहायता की कमी भारत में विज्ञान के विकास को उस गति से बाधित करती है जिस गति से देश में प्रतिभा की आवश्यकता होती है”।

जे.आर.डी. को भारत के लिए एक विश्व स्तरीय अनुसंधान संस्थान की आवश्यकता का एहसास हुआ और उन्होंने भाभा को सुझाव दिया कि उन्हें एक नया संस्थान स्थापित करने के लिए धन के लिए सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट को लिखना चाहिए।मार्च 1944 में भाभा ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट को एक प्रस्ताव भेजा। सर सोराब सकलाटवाला को लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा “मैंने पिछले कुछ समय से बंबई में भौतिकी की सबसे उन्नत शाखाओं में अनुसंधान का एक प्रथम श्रेणी स्कूल स्थापित करने का विचार रखा है……इस समय भारत में सैद्धांतिक और प्रायोगिक दोनों तरह से भौतिकी की मूलभूत समस्याओं पर शोध का कोई बड़ा स्कूल नहीं है… मौलिक भौतिकी में शोध का एक सशक्त स्कूल होना बिल्कुल भारत के हित में है , क्योंकि ऐसा स्कूल न केवल भौतिकी की कम उन्नत शाखाओं में बल्कि उद्योग में तत्काल व्यावहारिक अनुप्रयोग की समस्याओं में भी अनुसंधान का नेतृत्व करता है।उसी पत्र में वे लिखते हैं: “जब, मान लीजिए, अब से कुछ दशकों में, परमाणु ऊर्जा को बिजली उत्पादन के लिए सफलतापूर्वक लागू किया जाएगा, तो भारत को अपने विशेषज्ञों के लिए विदेशों की ओर नहीं देखना पड़ेगा, बल्कि वे तुरंत तैयार मिलेंगे।””जो योजना मैं अब आपको प्रस्तुत कर रहा हूं वह एक भ्रूण मात्र है जिससे मुझे आशा है कि समय के साथ भौतिकी का एक ऐसा स्कूल तैयार हो जाएगा जो कहीं भी सर्वश्रेष्ठ के बराबर हो।”सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टियों ने भाभा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

मई 1945 में, ट्रस्टियों ने बॉम्बे सरकार के सहयोग से, मौलिक अनुसंधान के लिए एक संस्थान को प्रायोजित करने का निर्णय लिया। इस संस्थान में भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर की कॉस्मिक रे यूनिट को शामिल करने और नए संस्थान का नाम – “द टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च” रखने का निर्णय लिया गया।
ट्रस्ट को पहेली मीटिंग दिनांक 18 मई 1945 को हुई एवं इस बैठक में वर्ष 1945-46 के लिए 80,000 रुपये के बजट का एक अस्थायी प्रस्ताव पारित किया गया। यह माना जा सकता है कि “द टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च “ संस्थान ने 1 जून, 1945 को भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर में अपना काम शुरू किया था। बाद में संस्थान को बॉम्बे में स्थानांतरित कर दिया गया और 19 दिसंबर, 1945 को बॉम्बे के गवर्नर सर जॉन कोलविले द्वारा औपचारिक रूप से उद्घाटन किया गया ।
दुनिया में अनुसंधान की स्थिति के बारे में एक यादगार उद्घाटन व्याख्यान में, भाभा ने विज्ञान के दार्शनिक पहलुओं पर भी चर्चा की: और कहा की विज्ञान ने आख़िरकार सभी के लिए घंटों की शारीरिक मेहनत से मुक्ति की संभावना खोल दी है और आज हम एक ऐसे युग की शुरुआत में खड़े हैं जब प्रत्येक व्यक्ति को अपने पूर्ण कद तक आध्यात्मिक रूप से खुद को विकसित करने का अवसर मिलेगा। परमाणु ऊर्जा में महारत हासिल करने और अन्य क्षेत्रों में विज्ञान की बढ़ती प्रगति के साथ, सौ वर्षों में दुनिया आज से उतनी ही अलग दिखेगी जितनी आज मध्य युग से अलग है। बाद में सितंबर 1949 में, संस्थान पेडर रोड पर अपने 6000 वर्ग फुट पुराने परिसर से गेटवे ऑफ इंडिया के पास ओल्ड यॉट क्लब में 35,000 वर्ग फुट में स्थानांतरित हो गया।

जब देश आजाद हुआ तो वे होमी जहांगीर भाभा ही थे जिन्होंने ने दुनिया भर में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों से अपील की कि वे भारत लौटे और अपने देश के उत्थान के लिए काम करे । यह बात उनके देश प्रेम का सर्वोच्च उदारहण है |उन्होने मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की सहायता से मार्च 1944 में नाभिकीय उर्जा पर अनुसन्धान आरम्भ किया। उन्होंने नाभिकीय विज्ञान में तब कार्य आरम्भ किया जब नाभिकीय श्रंखला अभिक्रिया का ज्ञान नहीं के बराबर था और नाभिकीय उर्जा से विद्युत उत्पादन की कल्पना को कोई मानने को तैयार नहीं था। उन्हें ‘आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम’ भी कहा जाता है।

उनकी अपील का असर हुआ और कुछ वैज्ञानिक भारत लौटे भी। इन्हीं में एक थे मैनचेस्टर की इंपीरियल कैमिकल कंपनी में काम करने वाले होमी नौशेरवांजी सेठना।
अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले सेठना में भाभा को काफी संभावनाएं दिखाई दीं। ये दोनों वैज्ञानिक भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने के अपने कार्यक्रम में जुट गए। यह कार्यक्रम मूल रूप से डॉ॰ भाभा की ही देन था, लेकिन यह सेठना ही थे, जिनकी वजह से डॉ॰ भाभा के निधन के बावजूद न तो यह कार्यक्रम रुका और न ही इसमें कोई बाधा आई। उनकी इसी लगन का नतीजा था कि 1974 में सेठना ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को बताया कि उन्होंने शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट की तैयारियां पूरी कर ली है। यह भी पूछा कि क्या वे इस सिस्टम को शुरू कर सकते हैं? इसके साथ ही उन्होंने यह भी बता दिया कि एक बार सिस्टम शुरू होने के बाद इसे रोकना संभव नहीं होगा, ऐसे में अगर वे मना कर देंगी तो उसे नहीं सुना जा सकेगा क्योंकि तब विस्फोट होकर ही रहेगा। इंदिरा गांधी की हरी झंडी मिलते ही तैयारियां शुरू हो गई। अगले ही दिन, 18 मई को सेठना ने कोड वर्ड में इंदिरा गांधी को संदेश भेजा- बुद्ध मुस्कराए। भारत का यह परमाणु विस्फोट इतना गोपनीय था।

डॉ़ होमी भाभा ने डॉ़ सेठना को भारत लौटने के बाद बहुत सोच-समझ कर केरल के अलवाए स्थित इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड का प्रमुख बनाया था, जहां उन्हाने मोनोज़ाइट रेत से दुर्लभ नाभिकीय पदार्थो के अंश निकाले। उस दौरान वे कनाडा-भारत रिएक्टर (सायरस) के प्रॉजेक्ट मैनेजर भी रहे। इसके बाद डॉ़ सेठना ने 1959 में ट्रांबे स्थित परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान में प्रमुख वैज्ञानिक अधिकारी पद का कार्यभार संभाला। यह प्रतिष्ठान आगे चल कर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र बना। वहां उन्हाने नाभिकीय ग्रेड का यूरेनियम तैयार करने के लिए थोरियम संयंत्र का निर्माण कराया। उनके अथक प्रयास और कुशल नेतृत्व से 1959 में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में प्लूटोनियम पृथक करने के प्रथम संयंत्र का निर्माण संभव हो सका। इसके डिजाइन और निर्माण का पूरा काम भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने ही किया। उल्लेखनीय है कि आगे चल कर इसी संयंत्र में पृथक किए गए प्लूटोनियम से वह परमाणु युक्ति तैयार की गई जिसके विस्फोट से 18 मई 1974 को पोखरण में ‘बुद्घ मुस्कराए’। डॉ़ सेठना के मार्गदर्शन में ही 1967 में जादूगुड़ा (झारखंड) से यूरेनियम हासिल करने का संयंत्र लगा। डॉ़ सेठना ने तारापुर के परमाणु रिऐक्टरों के लिए यूरेनियम ईंधन के विकल्प के रूप में मिश्र-ऑक्साइड ईंधन का भी विकास किया।
पोखरण में परमाणु विस्फोट के बाद अमेरिका ने यूरेनियम की आपूर्ति पर रोक लगा दी थी, हालांकि ये रिऐक्टर अमेरिका निर्मित ही थे। वह तो भला हो फ्रांस का कि उसने आड़े समय पर यूरेनियम देकर हमारी मदद कर दी अन्यथा डॉ़ सेठना तो मिश्र-ऑक्साइड से तारापुर के परमाणु रिऐक्टर को चलाने की तैयारी कर चुके थे। डॉ़ सेठना स्वावलंबन में विश्वास रखते थे और किसी भी काम को पूरा करने के लिए किसी के अहसान की जरूरत महसूस नहीं करते थे। वैज्ञानिक काम में उन्हें राजनैतिक दखल कतई पसंद नहीं थी।
वे परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के प्रबल पक्षधर थे। वे परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर 1958 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जेनेवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उप-सचिव रहे। वे संयुक्त राष्ट्र की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य थे और 1966 से 1981 तक अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के भी सदस्य रहे। डॉ सेठना अनेक संस्थानों के अध्यक्ष और निदेशक भी रहे। वे 1966 में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के निदेशक नियुक्त हुए और 1972 से 1983 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष रहे। इस पद पर होमी भाभा के बाद वे ही सबसे अधिक समय तक रहे। इस दौरान उन्हाने भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को नई गति प्रदान की। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे तमाम बड़े अलंकरणों से नवाजा गया। आज अगर भारत को एक परमाणु शक्ति के रूप में दुनिया भर में मान्यता मिली है, तो इसमें डॉ॰ भाभा के बाद सबसे ज्यादा योगदान डॉ॰ सेठना का ही है। डॉक्टर भाभा के नेतृत्व में भारत में एटॉमिक एनर्जी कमीशन की स्थापना की गई। उनके एटॉमिक एनर्जी के विकास के लिए समर्पित प्रयासों का ही परिणाम था कि भारत ने वर्ष 1956 में ट्रांबे में एशिया का पहले एटोमिक रिएक्टर की स्थापना की गई। केवल यही नहीं, डॉक्टर भाभा वर्ष 1956 में जेनेवा में आयोजित यूएन कॉफ्रेंस ऑन एटॉमिक एनर्जी के चेयरमैन भी चुने गए थे।  इस वास्ते इन्हें जेनेवा जाना था |

23 जनवरी, 1966 को होमी भाभा सारे दिन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफ़आर) के अपने दफ़्तर की चौथी मंज़िल पर काम करते रहे.

उनके सहयोगी रहे एमजीके मेनन ने अपने संस्मरण में लिखा कि , “उस दिन भाभा ने मुझसे करीब दो घंटे तक बात की. उन्होंने मुझे बताया कि उनके पास इंदिरा गांधी का फ़ोन आया था जो चार दिन पहले ही प्रधानमंत्री बनीं थीं. उन्होंने भाभा से कहा था कि मैं चाहती हूँ कि आप विज्ञान और तकनीक के हर मामले में मेरी सहायता करें. अगर उन्होंने वो ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ली होती तो उन्हें मुंबई से दिल्ली शिफ़्ट होना पड़ता. भाभा ने मुझे बताया कि उन्होंने इंदिरा गांधी की पेशकश स्वीकार कर ली है. उन्होंने मुझसे कहा कि वियना से वापस आने के बाद मैं तुम्हें टीआईएफ़आर का निदेशक बनाने का प्रस्ताव काउंसिल के सामने रखूँगा.”

भाभा के भाई जमशेद, माँ मेहरबाई, जेआरडी टाटा, मित्र पिप्सी वाडिया और उनके दाँतों के डॉक्टर फ़ाली मेहता को भी इंदिरा गांधी की इस पेशकश की जानकारी थी.हाल ही में प्रकाशित होमी भाभा की जीवनी ‘होमी भाभा अ लाइफ़’ के लेखक बख़्तियार के दादाभौय लिखते हैं, “भाभा ने मेनन को साफ़-साफ़ तो ये नहीं बताया कि इंदिरा गांधी ने उनके सामने क्या पेशकश की थी लेकिन मेनन का अंदाज़ा था कि इंदिरा ने उन्हें अपने कैबिनेट में मंत्री का पद ऑफ़र किया था.”

भाभा का विमान पहाड़ से टकराया

डा. भाभा  24 जनवरी, 1966 को भाभा वियना जाने के लिए एयर इंडिया की फ़्लाइट 101 पर सवार हुए थे. उस ज़माने में बंबई से वियना की सीधी फ़्लाइट नहीं हुआ करती थी और लोगों को जिनेवा में फ़्लाइट बदल कर वियना जाना पड़ता था. भाभा ने एक दिन पहले जिनेवा जाने वाली फ़्लाइट की बुकिंग कराई थी लेकिन किन्हीं कारणों से उन्होंने अपनी यात्रा एक दिन के लिए स्थगित कर दी थी.

24 जनवरी को एयर इंडिया का बोइंग 707 विमान ‘कंचनजंघा’ सुबह 7 बजकर 2 मिनट पर 4807 मीटर की ऊँचाई पर मोब्लां पहाड़ियों से टकरा कर दुर्घटनाग्रस्त हो गया.ये विमान दिल्ली, बेरूत और जिनेवा होते हुए लंदन जा रहा था. इस क्रैश में सभी 106 यात्री और 11 विमानकर्मी मारे गए थे. कंचनजंघा लगभग उसी स्थान पर क्रैश हुआ था, जहाँ नवंबर, 1950 में एयर इंडिया का एक और विमान ‘मलाबार प्रिंसेज़’ क्रैश हुआ था.’मलाबार प्रिसेज़’ और ‘कंजनजंघा’ दोनों विमानों का मलबा और उस पर सवार लोगों के शव कभी नहीं मिल पाए. उस विमान का ब्लैक बॉक्स भी नहीं मिल पाया था. ख़राब मौसम के कारण विमान का मलबा खोजने का काम रोक देना पड़ा था.

फ़्रेंच जाँच समिति ने सितंबर, 1966 में फिर से अपनी जाँच शुरू की थी और मार्च 1967 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में उसने कहा था, “पहाड़ पर भारी बर्फ़बारी और पायलट और एयर ट्रैफ़िक कंट्रोलर के बीच ग़लतफ़हमी के कारण ये दुर्घटना हुई थी. विमान के कमांडर ने मोब्लां से अपने विमान की दूरी का ग़लत अंदाज़ा लगाया था. विमान का एक रिसीवर भी काम नहीं कर रहा था.” भारत सरकार ने फ़्रेंच जाँच रिपोर्ट को स्वीकार कर  तो लिया और  फाइल बंद कर दी |

किन्तु सन 2017 में एक स्विस पर्वतारोही डेनियल रोश को आल्प्स पहाड़ों पर एक विमान का मलबा मिला था जिसके बारे में कहा गया था कि ये उसी विमान का मलबा था जिसमें होमी भाभा सफ़र कर रहे थे. इस दुर्घटना से संबंधित साज़िश की अटकलें इसमें अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए का हाथ बताती हैं. वर्ष 2008 में एक पुस्तक ‘कन्वरसेशन विद द क्रो’ में पूर्व सीआईए अधिकारी रॉबर्ट क्रॉली और पत्रकार ग्रेगरी डगलस के बीच एक कथित बातचीत प्रकाशित हुई थी जिससे लोगों को आभास मिला कि इस दुर्घटना में सीआईए का हाथ था. सीआईए में क्रॉली को ‘क्रो’ के नाम से जाना जाता था और सीआईए में उन्होंने अपना पूरा करियर वहाँ के योजना निदेशालय में बिताया था जिसे ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ डर्टी ट्रिक्स’ भी कहा जाता था.

अक्तूबर, 2000 में अपनी मृत्यु से पहले क्रॉली की डगलस से कई बार बातचीत हुई थी. उसने डगलस को दस्तावेज़ों से भरे दो बक्से भेजे थे और निर्देश दिए थे कि उन्हें उनकी मौत के बाद खोला जाए.पाँच जुलाई, 1996 को हुई बातचीत में डगलस ने क्रॉली को कहते बताया था, “साठ के दशक में हमारी भारत से मुश्किलें शुरू हो गईं थीं जब उसने परमाणु बम पर काम करना शुरू कर दिया था. वो दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि वो कितने चालाक हैं और जल्द ही वो दुनिया की एक बड़ी ताकत बनने जा रहे हैं. दूसरी चीज़ ये थी कि वो सोवियत संघ के कुछ ज़्यादा ही नज़दीक जा रहे थे.”

इसी पुस्तक में क्रो ने भाभा के बारे में कहा था, “वो भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक हैं और वो परमाणु बम बनाने में पूरी तरह सक्षम थे. भाभा को कई बार इस बारे में सचेत किया गया था लेकिन उन्होंने उस ओर ध्यान नहीं दिया था. भाभा ने ये स्पष्ट कर दिया था कि दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें और भारत को दूसरी परमाणु शक्तियों के बराबर आने से नहीं रोक सकती. वो हमारे लिए एक ख़तरा बन गए थे. वो एक हवाई दुर्घटना में मारे गए थे जब उनके बोइंग 707 के कार्गो होल्ड में रखा बम फट गया था.”

आज  भी  इस आधुनिक युग में गोया , बहूत से  वैज्ञानिक और नेता किन्ही अनजाने  अथवा विरोधी देशो की गुप्तचर  संस्थाओ  का शिकार हो रहे  और जिनकी मौत के कारण सपष्ट नहीं हो पा रहे है,  तो  70 के दशक में तो यह काम बहुत आसान रहा होगा  |  बहरहाल यह सच है कि   डा. भाभा की मृत्यु  हमारे लिए आज भी एक रहष्य  ही है | इस महँ वैज्ञानिक को हम देशवाशियों का शत शत नमन  ….

Author

Scroll to Top